संस्था का इतिहास

श्रीमति नीरा राव और श्री प्रभाकर राव ने उनके इकलौते लड़के श्री सत्यजीत (जीत) को कैन्सर की वजह से खोया| जीत दिसंबर १९९५ से मई १९९६ तक टी-सेल लिम्फोमा बीमारी से पीड़ित थे| उस समय वह अमेरिका के डेनेवर कोलोराडो में थे| जीत की मृत्यु २३ मई १९९६ को डेनेवर में हो गई| श्रीमति और श्री राव ने अपने दु:ख को एक नया मोड़ दिया और कैन्सर के बारे में जानकारी को प्रसारित करने का बीड़ा उठाया| इस तरह कैन्सर रोगियों के लिये एक संवेदनशील संस्था की नींव पड़ी जो उनको कैन्सर के बारे में सरल शब्दों में ज्ञान देती है और हर तरह से सहायता करती है|

जासकैप (जीत एसोसिएशन फॉर सपोर्ट टू कैन्सर पेशंट्स) १६ अक्टुबर १९९६ में एक पंजीकृत संस्था बन गई और दिसंबर १९९६ को सार्वजानिक धर्मार्थ ट्रस्ट घोषित की गई| इस को दी गई दानराशी को आयकर में छूट मिलने का प्रावधान है|